
साहित्य अकादेमी दिल्ली एवं संस्कृति मंत्रालय द्वारा आयोजित कार्यक्रम में शकुंतला तरार ने छत्तीसगढ़ की बोलियों पर उनके संरक्षण, संवर्धन और विस्तार पर अपने सारगर्भित विचार प्रकट करते हुए कहा कि भाषा जहाँ माथे का मुकुट होती है तो वहीं बोलियाँ उस मुकुट में जड़ित रत्न मणियाँ होती हैं जो भाषा रूपी मुकुट को सुंदरता और मजबूती प्रदान करती हैं। ।
शकुंतला छत्तीसगढ़ की इकलौती महिला साहित्यकार हैं जो विगत 2014 से अकादेमी के कार्यक्रमों में छत्तीसगढ़ छत्तीसगढ़ी और विविध लोक भाषा बोलियों पर अपनी बात मजबूती से रखती आई हैं। उन्होंने अपने वक्तव्य में बताया कि मिनिस्ट्री ऑफ ट्राईबल अफेयर्स के -द्वारा छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में कुल मिलाकर –18 स्थानीय बोलियों में कक्षा 1 से 5 तक शिक्षा का प्रावधान किया गया है जिनमें –छत्तीसगढ़ी, सरगुजिहा, हल्बी,सादरी, गोंडी, कुडुख, भतरी, बंजारी, मुरिया, माड़िया, धुरवा, दोरला, कोरवा, बैगानी,भुंजिया,धनवारी, सावरा आदि बोलियाँ हैं । अतः संभवतः इन सभी बोलियों का मानकीकरण किया जा चुका है। बोलियाँ एक समाज का दर्पण होती हैं ।
शकुंतला ने तीजन बाई जी का उदाहरण देते हुए कहा कि चेहरे की भाव भंगिमा, उसका प्रस्तुतिकरण का ढंग भी भाषा बोली को समृद्ध बनाते हैं अन्यथा छत्तीसगढ़ी न जानने वाले भी पंडवानी सुनकर उसके प्रवाह में बह नहीं जाते।
शकुंतला को उनकी इस उपलब्धि के लिए बधाई




