देशमनोरंजन

The Vvaan Movie Review: लोककथा और सुपरहीरो का मेल, लेकिन कहानी नहीं पकड़ पाती रफ्तार

Contact Us :- 9862856285 Contact Us :- 9862856285

पंडित यशवर्धन पुरोहित

सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया की फिल्म ‘द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ एक ऐसे विषय के साथ पर्दे पर आती है, जिसमें भारतीय लोककथा, रहस्य, आस्था और फैंटेसी को एक बड़े सिनेमाई कैनवास पर उतारने की कोशिश की गई है। बिहार की पृष्ठभूमि, देव वन की रहस्यमयी दुनिया और छठ पूजा का सांस्कृतिक परिवेश फिल्म को शुरुआत में एक अलग पहचान देता है। मगर फिल्म आगे बढ़ने के साथ इसकी सबसे बड़ी कमजोरी सामने आती है—कहानी कई दिशाओं में जाती है, लेकिन किसी एक दिशा को मजबूती से पकड़ नहीं पाती।

रेटिंग: 2/5

रहस्यमयी जंगल से शुरू होती कहानी

फिल्म का केंद्र है ऋषि, जिसका किरदार सिद्धार्थ मल्होत्रा ने निभाया है। शहर में रहने वाला ऋषि अपने अतीत और पुश्तैनी गांव से काफी दूर हो चुका है। पत्नी ममता के साथ उसका निजी जीवन भी एक भावनात्मक खालीपन से गुजर रहा है।

छठ के मौके पर गांव लौटने के बाद ऋषि का सामना ऐसी घटनाओं से होता है, जिन्हें वह शुरुआत में महज अंधविश्वास मानता है। गांव के पास स्थित देव वन को लेकर पीढ़ियों से कई रहस्यमयी मान्यताएं चली आ रही हैं। कहा जाता है कि जंगल में एक अलौकिक शक्ति का वास है और सूर्यास्त के बाद वहां जाना खतरे से खाली नहीं।

यहीं से फिल्म वास्तविक दुनिया से फैंटेसी की दुनिया में प्रवेश करती है।

आइडिया बड़ा, लेकिन कहानी कमजोर

फिल्म में कई दिलचस्प तत्व हैं—लोककथा, रहस्यमयी शक्तियां, पुश्तैनी विरासत, वन देवी, पारिवारिक रहस्य और सुपरहीरो जैसी क्षमताएं। समस्या इन विचारों में नहीं, बल्कि उनके आपसी जुड़ाव में है।

शुरुआती हिस्से में फिल्म दर्शक की उत्सुकता बनाए रखती है। देव वन का रहस्य और ऋषि के सामने आने वाली घटनाएं आगे की कहानी को लेकर उम्मीद पैदा करती हैं। लेकिन बाद के हिस्से में लगातार नए मोड़ और नई जानकारियां जुड़ती जाती हैं। इससे कहानी का मूल भाव कमजोर पड़ने लगता है।

सिद्धार्थ मल्होत्रा का प्रदर्शन

सिद्धार्थ मल्होत्रा का किरदार फिल्म की कहानी के सबसे महत्वपूर्ण बदलावों में से एक है। एक तर्कवादी व्यक्ति का धीरे-धीरे उस दुनिया को स्वीकार करना, जिसे वह पहले अंधविश्वास समझता था, कहानी का अहम हिस्सा है।

हालांकि इस मानसिक बदलाव को अभिनय के स्तर पर पूरी ताकत नहीं मिल पाती। कुछ भावनात्मक और तनावपूर्ण दृश्यों में सिद्धार्थ का प्रदर्शन सीमित प्रभाव छोड़ता है। उनके किरदार के भीतर चल रहे संघर्ष को और गहराई मिलती तो कहानी ज्यादा प्रभावशाली हो सकती थी।

तमन्ना भाटिया को नहीं मिला पर्याप्त स्पेस

तमन्ना भाटिया ने ममता के किरदार में सहज अभिनय किया है। उनका स्क्रीन प्रेजेंस अच्छा है और छठ से जुड़े दृश्यों में उनकी मौजूदगी फिल्म के सांस्कृतिक माहौल को मजबूत करती है।

लेकिन समस्या यह है कि उनका किरदार कहानी में उतनी सक्रिय भूमिका नहीं निभा पाता, जितनी उम्मीद की जाती है। फिल्म की घटनाओं पर ममता का प्रभाव सीमित दिखाई देता है।

सुनील ग्रोवर को अलग तरह के किरदार में देखने का मौका मिलता है, लेकिन उनकी पुरानी कॉमिक इमेज गंभीर दृश्यों में कई बार बाधा बनती है। मनीष पॉल और सुलभा आर्या को दिया गया हास्य पक्ष भी मुख्य कहानी के साथ पूरी तरह सहज नहीं बैठता।

निर्देशन में टोन का उतार-चढ़ाव

निर्देशक दीपक कुमार मिश्रा ने फिल्म को पारंपरिक हॉरर या फैंटेसी तक सीमित नहीं रखा है। फिल्म में लोककथा, धार्मिक आस्था, हॉरर, फैंटेसी और सुपरहीरो शैली को मिलाने का प्रयास किया गया है।

लेकिन यही प्रयोग फिल्म की कमजोरी भी बन जाता है। एक दृश्य में फिल्म रहस्य पैदा करती है तो अगले ही पल उसका मूड बदल जाता है। कई जगह ऐसा लगता है कि फिल्म अपनी शैली तय करने के लिए संघर्ष कर रही है।

देव वन को फिल्म का सबसे प्रभावशाली किरदार बनाया जा सकता था। जंगल का वातावरण, वहां का सन्नाटा और उससे जुड़ी लोककथाएं डर और रोमांच पैदा कर सकती थीं, लेकिन कई दृश्यों में इसका इस्तेमाल केवल विजुअल लोकेशन के तौर पर रह जाता है।

VFX ने नहीं बढ़ाया असर

फिल्म का फैंटेसी और सुपरहीरो पक्ष VFX पर काफी निर्भर है। कुछ दृश्य अच्छे नजर आते हैं, लेकिन कई महत्वपूर्ण क्षणों में विजुअल इफेक्ट्स उस स्तर की भव्यता नहीं ला पाते जिसकी कहानी मांग करती है।

विशेष रूप से क्लाइमैक्स में एक्शन और अलौकिक शक्तियों वाले दृश्यों में VFX कुछ जगह कृत्रिम लगता है। स्लो-मोशन का इस्तेमाल भी हर बार प्रभाव बढ़ाने में सफल नहीं होता।

छठ और बिहार की संस्कृति बनी फिल्म की खासियत

फिल्म की सबसे दिलचस्प बात इसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि है। बिहार, छठ पूजा और स्थानीय लोकविश्वास को कहानी का हिस्सा बनाने की कोशिश की गई है।

छठ से जुड़े दृश्य देखने में आकर्षक हैं और फिल्म को भारतीय सांस्कृतिक पहचान देते हैं। हालांकि, कई जगह यह संस्कृति कहानी के भीतर पूरी तरह घुलने के बजाय सिर्फ बैकग्राउंड का हिस्सा लगती है। अगर स्थानीय लोककथाओं और ग्रामीण जीवन को कहानी के साथ और गहराई से जोड़ा जाता, तो फिल्म का प्रभाव काफी बढ़ सकता था।

पटकथा ने बिगाड़ा पूरा खेल

फिल्म की सबसे बड़ी परेशानी इसका स्क्रीनप्ले है। कहानी में कल्पना की कमी नहीं है, लेकिन घटनाओं के बीच मजबूत भावनात्मक और तार्किक कड़ी कई जगह गायब दिखाई देती है।

ऋषि के नजरिए में बदलाव को धीरे-धीरे विकसित करने के बजाय कुछ जगह जल्दी आगे बढ़ा दिया गया है। इसी तरह कई रहस्यों को जिस तरीके से खोला जाता है, उससे सस्पेंस बढ़ने के बजाय कहानी की पकड़ कमजोर पड़ती है।

अंतिम फैसला

‘द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ एक महत्वाकांक्षी फिल्म है। भारतीय लोककथा और छठ पूजा की पृष्ठभूमि में फैंटेसी तथा सुपरहीरो कहानी कहने का विचार निश्चित रूप से अलग है। फिल्म में कुछ खूबसूरत दृश्य और दिलचस्प अवधारणाएं भी हैं।

लेकिन कमजोर पटकथा, असमान गति, बदलता हुआ टोन और औसत VFX फिल्म की संभावनाओं को पूरी तरह सामने नहीं आने देते। कलाकारों की मौजूदगी और सांस्कृतिक परिवेश आकर्षण पैदा करते हैं, मगर कहानी दर्शक को अंत तक मजबूती से बांधे रखने में सफल नहीं हो पाती।

कुल मिलाकर, फिल्म का कॉन्सेप्ट बड़ा है, लेकिन उसका निष्पादन उतना असरदार नहीं बन पाया।

Related Articles

Back to top button