छत्तीसगढ़राज्य

यूएई के शेख से गर्मजोशी और मेलोनी के साथ ‘मेलोडी’ डिप्लोमेसी;

 

  • भारत का मुस्लिम-ईसाई समुदाय पूछ रहा— हमारी बारी कब आएगी- अफरोज खान
  • अल्पसंख्यकों के मन में उठते सुलगते सवाल

सूरजपुर। ​प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हालिया पांच दिवसीय विदेश दौरा पर टिप्पणी करते हुवे अल्पसंख्यक कांग्रेस कमेटी के प्रदेश महासचिव अफरोज खान ने कहा की एक बार फिर प्रधानमंत्री मोदी जी अंतरराष्ट्रीय मीडिया और सोशल मीडिया की सुर्खियों में है।

दौरे के पहले पड़ाव पर जब प्रधानमंत्री यूएई पहुंचे, तो वहां के क्राउन प्रिंस शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान(मुसलमान )से उनकी गर्मजोशी देखने लायक थी। दोनों नेताओं का दौड़कर गले मिलना, खिलखिलाकर हंसना और तोहफों का आदान-प्रदान कूटनीति के लिहाज से एक शानदार तस्वीर थी।
​इसके बाद वे इटली पहुंचे, जहां प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी (ईसाई )के साथ उनकी केमिस्ट्री और सोशल मीडिया पर वायरल ‘मेलोडी’ के ट्रेंड्स ने खूब सुर्खियां बटोरीं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के प्रधानमंत्री का यह सहज और दोस्ताना अंदाज निश्चित रूप से देश की ‘सॉफ्ट पावर’ को मजबूत करता है।

इस दौरे पर टिप्पणी करते हुवे छत्तीसगढ़ अल्पसंख्यक कांग्रेस कमेटी के प्रदेश महासचिव अफरोज खान में कहा की ​विदेशी सरजमीं पर मुसलमानों और ईसाइयों के साथ प्रधानमंत्री की यह खुशमिजाजी जहां दुनिया को भारत के ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के विचार से जोड़ती है, वहीं देश के भीतर एक बड़े वर्ग को सोचने पर मजबूर कर देती है।
​भारत के मुस्लिम और ईसाई समुदाय का एक बड़ा हिस्सा पिछले एक दशक से अधिक समय से इसी तरह के अपनत्व, संवाद और कूटनीतिक नहीं तो कम से कम सामाजिक आलिंगन की उम्मीद लगाए बैठा है।

लेकिन जब देश के भीतर की हकीकत को देखा जाता है, तो यह उम्मीदें बिखरती नजर आती हैं। अफरोज खान ने आगे कहा की सवाल यह उठता है की क्या वैश्विक मंचों पर जो ‘सबका साथ, सबका विकास’ एक आदर्श वाक्य बनकर चमकता है, वह देश की सीमा के भीतर आते ही धुंधला क्यों हो जाता है?

​क्या ‘अपनत्व’ के लिए पासपोर्ट बदलना होगा? ​ देश के अल्पसंख्यकों के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या विदेश में बसे मुस्लिम और ईसाई अधिक सौभाग्यशाली हैं, जिन्हें देश के मुखिया का सीधा स्नेह और सम्मान मिल रहा है?

​आज भारत का आम अल्पसंख्यक युवा, व्यापारी और बुद्धिजीवी यह पूछने पर मजबूर है की क्या देश के भीतर सौहार्द का माहौल पाने के लिए किसी वैश्विक कूटनीति का हिस्सा होना जरूरी है? ​क्या देश का अल्पसंख्यक नागरिक तब तक मुख्यधारा के संवाद से दूर रहेगा, जब तक उसे सिर्फ एक ‘वोट बैंक’ या राजनीतिक ध्रुवीकरण के चश्मे से देखा जाता रहेगा?

​कूटनीति और घरेलू राजनीति का दोहरा मापदंड
​यूएई में शेख को गले लगाना ‘सफल विदेश नीति’ है, और इटली में वैश्विक नेताओं के साथ हंसते हुए तस्वीरें खिंचवाना ‘ग्लोबल इमेज’ का हिस्सा है। लेकिन जब बात देश के अंदरूनी हालातों की आती है, तो नैरेटिव बदल जाता है।

​मस्जिद-चर्च के विवादों पर शीर्ष नेतृत्व की लंबी चुप्पी, हेट स्पीच (भड़काऊ बयानों) पर सख्त कार्रवाई का अभाव, और चुनाव आते ही ’80 बनाम 20′ या कपड़ों से पहचानने वाले बयानों की राजनीति— ये सब घरेलू नीति का हिस्सा बन चुके हैं। विदेश में भारत को ‘लोकतंत्र की जननी’ बताया जाता है, लेकिन देश के भीतर नागरिक समाज और अल्पसंख्यकों के मन में असुरक्षा का भाव पनपता है।

​अफरोज खान ने आगे कहा की ​भारत का मुस्लिम और ईसाई समाज आज किसी विशेष उपकार की मांग नहीं कर रहा है; वह सिर्फ उसी संवैधानिक संरक्षण, सम्मान और अपनत्व की उम्मीद करता है जो प्रधानमंत्री विदेशों में खुले दिल से बांटते हैं।

​अगर देश के भीतर अल्पसंख्यकों को गले लगाने, उनके त्योहारों पर वैसी ही गर्मजोशी दिखाने के लिए कूटनीतिक मजबूरियों या चुनावी समीकरणों का इंतजार करना पड़े, तो ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ का नारा अधूरा रह जाता है। जब तक देश के भीतर आंतरिक मोहब्बत और संवाद का पुल नहीं बनेगा, तब तक विदेश की ये शानदार तस्वीरें केवल एक ‘फोटो-ऑप’ बनकर रह जाएंगी। ​अल्पसंख्यकों को गले लगाने के लिए अगर सात समंदर पार जाना पड़े, तो देश के भीतर के खालीपन को कौन भरेगा?

Related Articles

Back to top button