
हिंदुस्तान का स्वतंत्रता संग्राम एक लंबा, कठिन और बलिदानों से भरा इतिहास है, जिसमें देश के सभी वर्गों, धर्मों और समुदायों ने कंधे से कंधा मिलाकर हिस्सा लिया। इस महान आंदोलन में मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और अविस्मरणीय है। स्वतंत्रता के इस संग्राम में मुस्लिम नेताओं, बुद्धिजीवियों, उलेमाओं, क्रांतिकारी युवाओं और आम नागरिकों ने अपने प्राणों की आहुति दी और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ हर मोर्चे पर डटकर मुकाबला किया। इस लेख में हम कुछ प्रख्यात और कुछ गुमनाम मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों की वस्तुनिष्ठ सेवाओं का ऐतिहासिक अवलोकन करेंगे, जिन्होंने स्वतंत्र भारत की नींव रखी l
प्रथम पंक्ति के मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानी
मौलाना अबुल कलाम आजादः ज्ञान-विज्ञान और एकता के प्रतीक
मौलाना अबुल कलाम आजाद की गिनती भारत की स्वतंत्रता के प्रथम पंक्ति के नेताओं में होती है। वह केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि एक उच्च कोटि के विद्वान, पत्रकार, कुरान के व्याख्याकार (मुफस्सिर) और विचारक भी थे। उन्होंने 1912 में अपने अखबार ‘अल-हिलाल’ और बाद में ‘अल-बलाग’ के माध्यम से ब्रिटिश सरकार की शोषक नीतियों की कड़ी आलोचना की और मुस्लिम समुदाय के साथ-साथ आम हिंदुस्तानियों में जागरूकता पैदा की।
मौलाना आजाद इंडियन नेशनल कांग्रेस के सबसे कम उम्र के अध्यक्ष चुने गए और 1940 से 1946 तक के अत्यंत नाजुक दौर में (जब द्वितीय विश्व युद्ध चरम पर था और स्वतंत्रता आंदोलन निर्णायक चरण में था) कांग्रेस की अध्यक्षता की। उनके राजनीतिक चिंतन की सबसे बड़ी विशेषता हिंदू-मुस्लिम एकता पर उनका अटूट विश्वास था। उन्होंने द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के आधार पर भारत के विभाजन का कड़ा विरोध किया और हमेशा एक अखंड और धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) भारत का सपना देखा। स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री के रूप में, उनकी सेवाएं (जिनमें आईआईटी और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की स्थापना शामिल है) देश के आधुनिक शैक्षिक ढांचे की नींव हैं।
खान अब्दुल गफ्फार खान सीमांत गांधी और अहिंसा की प्रतिमूर्ति
खान अब्दुल गफ्फार खान, जिन्हें श्रद्धा से सीमांत गांधी’ या ‘बाचा खान’ कहा जाता है. सूबा सरहद (वर्तमान खैबर पख्तूनख्वा) के एक महान पश्तून नेता थे। उन्होंने 1929 में खुदाई खिदमतगार (ईश्वर के सेवक) नामक संगठन की स्थापना की, जिसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक सुधार और ब्रिटिश राज के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रतिरोध था।
पश्तूनों जैसी पारंपरिक रूप से लड़ाकू कौम को अहिंसा के मार्ग पर संगठित करना उनका एक महान ऐतिहासिक कारनामा था। बाचा खान ने खिलाफत आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उन्होंने अपने जीवन का एक लंबा हिस्सा (लगभग तीन दशक) ब्रिटिश जेलों में बिताया। मौलाना आजाद की तरह, उन्होंने भी भारत के विभाजन का पुरजोर विरोध किया था और जब कांग्रेस ने विभाजन का फैसला स्वीकार कर लिया, तो उन्होंने यह ऐतिहासिक वाक्य कहा था कि ‘आपने हमें भेड़ियों के आगे फेंक दिया है”।
मौलाना मोहम्मद अली जौहर स्वतंत्रता आंदोलन के निर्भीक नेता
मौलाना मोहम्मद अली जौहर भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के एक अत्यंत निर्भीक, निडर और ओजस्वी नेता थे। उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ अपनी कलम को हथियार बनाया और अपने प्रसिद्ध अंग्रेजी अखबार ‘कॉमरेड (Comrade) और उर्दू अखबार ‘हमदर्द’ के माध्यम से जबरदस्त पत्रकारीय और वैचारिक अभियान चलाया। वह ऐतिहासिक ‘खिलाफत आंदोलन के सबसे प्रमुख और प्रथम पंक्ति के नेता थे, जिसने हिंदुओं और मुसलमानों को ब्रिटिश राज के खिलाफ एक मजबूत और संयुक्त मंच पर इकट्ठा किया। असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement) के दौरान उन्होंने महात्मा गांधी के कंधे से कंधा मिलाकर काम किया और जेल की यातनाएं सहीं। राजनीतिक क्षेत्र के साथ-साथ शैक्षिक क्षेत्र में भी उनकी सेवाएं अविस्मरणीय हैं. जामिया मिलिया इस्लामिया’ की स्थापना उनकी दूरदर्शिता और प्रयासों का ही एक महान परिणाम है। 1930 में लंदन में हुए प्रथम गोलमेज सम्मेलन के दौरान उनका यह ऐतिहासिक और गूंजता हुआ वाक्य स्वतंत्रता के प्रति उनके अटूट संकल्प को दर्शाता है कि में एक गुलाम देश में वापस जाने के बजाय एक स्वतंत्र देश में मरना पसंद करूंगा। कुदरत ने उनकी यह बात पूरी की, लंदन में ही उनका निधन हुआ और उन्हें बैतुल मुकद्दस (यरुशलम) में सुपुर्द-ए-खाक किया गया।
अशफाक उल्ला खानः क्रांति और बलिदान की महान मिसाल
स्वतंत्रता आंदोलन में अशफाक उल्ला खान क्रांति और बलिदान की महान मिसाल हैं। स्वतंत्रता आंदोलन में जहां शांतिपूर्ण राजनीतिक संघर्ष का रास्ता अपनाया गया, वहीं क्रांतिकारी युवाओं का सशस्त्र प्रतिरोध भी इतिहास का एक सुनहरा अध्याय है। अशफाक उल्ता खान का संबंध इसी क्रांतिकारी समूह से था। वह ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ के सक्रिय सदस्य थे।
9 अगस्त 1925 को हुए प्रसिद्ध ‘काकोरी ट्रेन एक्शन (जिसमें ब्रिटिश खजाने को लूटा गया था) में उनकी मुख्य भूमिका थी। अशफाक उल्ला खान और उनके करीबी दोस्त पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की वैचारिक समानता और दोस्ती हिंदू-मुस्लिम एकता की एक अमर मिसाल है। जब उन्हें ब्रिटिश सरकार द्वारा फांसी की सजा सुनाई गई, तो उन्होंने दया की कोई अपील करने के बजाय अत्यंत साहस के साथ मौत को गले लगा लिया। उनकी शहादत ने पूरे भारत के युवाओं में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ तीव्र आक्रोश और स्वतंत्रता की एक नई भावना फूंक दी।



